Hindi poem on food (poori) etc.

The following Hindi poem/rhymes is a blow-by-blow account of how me and my friends went to eat Loochi (poori or Kachori, Bengali) dish in a programme on the Bengali bard’s 150th birth anniversary (9 May 2011, SSS auditorium). We (non-Bengalis) attended the programme for some time and wondered when the food packets will arrive as the programme (in Bengali) started. This is our experience of the evening. This Hindi poem may be somewhat useful for kids and others. The aim is humour and not contempt. So take it accordingly.

 

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आओ साथी लूची खाएं

 

आओ आओ आयशा–रूचि

चलो दबा के खाएं लूची

लूची खा के मस्त हो जाएँ

इतिहास  में दर्ज हो जाएँ

 

आओ चलो कार्यक्रम हो आयें

मिष्टी दोही व् लूची खाएं

जाने सबको क्या थी सूझी

पहुँच गए सब खाने लूची

 

साढ़े छ में निकल पड़े सब

भूख लगी थी सबको जब

सभागार में बैठ गए सब—

जाने लूची आएगी कब?!

 

लूची की बस आस लगाये

एक घंटे कार्यक्रम दिखाए

थोड़ी-बहुत की पड़ताल

भूख से सब हुए बेहाल

 

सभागार में कुनमुनाते सारे—

‘खाने का डब्बा कहीं दिखा रे?’

पेट में चूहे कूद रहे थे

लूची को ही खोज रहे थे

 

चलो वापिस मेस चलें सब

करेला खा के पेट भरें सब

भूख तो मिटानी है—

लूची तो आनी जानी है

 

तो सबने करेला खाया

कुछेक को मैगी भाया

फिर भी लूची का मोह सताया

सबके मुंह में पानी आया

 

तय हुआ कि फिर चलें सब

लूची का आनंद लें अब

अनुश्री से सन्देश था आया—

क्या आप सब ने कुछ खाया?

 

शरमा-शरमा के खाने पहुंचे

लूची के बहाने पहुंचे

थोडा और इन्तेजार कराया

लूची ने सबको खूब पकाया

 

फिर मुघ्नी ने फीता काटा

चारों ओर था सन्नाटा

फिर सबने ६-६ लूची खायी

और जन्नत की सैर लगायी

 

चतुर्वेदी जी ने लूची खायी

फिर जफरू की बाइक चलायी

वापिस सब हॉस्टल में आये

लिम्का पी के प्यास बुझाये

 

इन्तेजार तो खूब कराया

पर आंखिरकार कल ही खिलाया

आओ साथी लूची खाएं

लूची खा के धूम मचाएं

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