Share the load- हाथ बंटाओ |A Poem

Written by vik

Topics: हिन्दी/Hindi Posts

This is a 700-word Hindi Poem exhorting men to share the load in domestic works. It uses humour to highlight how a man’s life  from cradle to grave is privileged and it is women in the house who do all the tasks. Think of this also a poem on women’s empowerment, condition of women (and men) in India, poem on gender, unjust division of labour, poem or slogans, rhyme, song, ad copy on Indian society. The poem chronicles the life of men as children, kids, adolescents, adults, married men, old men, husbands, brothers and informs how they have avoided domestic works, helping the women in home. Finally, it suggests that helping with domestic work will actually make homes happy. I am writing for the #ShareTheLoad activity at BlogAdda.com in association with Ariel. Copyrighted to Vikas. And you will find more poems, write ups on women, social issues on this site.

आँखें खोलो होश में आओ
हर काम में हाथ बंटाओ |
कपडे धो डालो, खाना पकाओ
देश के मर्दों, जाग जाओ |

अपना बचपन झाँक के देखो,
जवानी-बुढ़ापा आंक के देखो
तुम बस करते हो आराम
औरत करती है सब काम |

हाँ, तुम अक्सर कमाते हो
और काफी इठलाते हो
कभी जुए-शराब में उड़ाते हो
घर को सर पे उठाते हो |

बचपन में कुछ काम किया था ?
घर का काम आसान किया था ?
माँ, बहन करती थी काम
तुम बस करते थे आराम |

कपडा धोती थी माँ तुम्हारी
बहन बनाती थी खाना
तुम बस खेलते-कूदते थे
फिरते थे बन दीवाना |

घर से सुबह निकलते थे
सदा ऐश में पलते थे |
शाम में फिर आते थे
मुफ्त की रोटी खाते थे |

कपडा तेरा धुल जाता था
इस्तरी भी हो जाती थी |
माँ तुम्हारी खटती थी
बहन हाथ बंटाती थी |

अब शादी हो गयी तुम्हारी
पर गयी नहीं अभी खुमारी
कामचोर हो, दिखाते होशियारी
खट रही अब बीबी तुम्हारी !

खाना-पीना, साफ-सफाई
झाड़ू-पोछा और सिलाई,
घर की औरतें करती काम
मर्द को चाहिए बस आराम |

‘सीता, लक्ष्मी’ करते गुणगान
चिल्लाते हो ‘भारत महान’
तो घरेलू काम का हो सम्मान
और हाथ बंटाए हर इंसान |

खाना-पीना, साफ-सफाई
झाड़ू-पोछा और सिलाई
माँ, बीबी, या बहन ही क्यूं
क्यों ने करे इसे बाप या भाई ?

आँख रहते भी हम अंधे हैं
दिखता नहीं है ये अन्याय |
अपने ही परिवार पे देखो
जुल्म ढा रहे पिता और भाई !

क्यों पता नहीं चलता क्या सही है
जब अपने ही घर में बराबरी नहीं है !
हर किसी को समाज की परवाह है
पर अपने घर में बना लापरवाह है !

मानो भगवान ने लिख के भेजा
कि पुरुष ही होगा सदा प्रधान,
औरत करे झाड़ू-पोछा, साफ-सफाई
हो इस समाज का यही विधान !?

पूरा बचपन शायद ही कभी
हमने एक कपडा धोया !
बाहर से लौटे, कपडे फेंकें
अगले दिन उन्हें साफ-सुथरा पाया !

जितनी मर्जी दबा के खाते
किसी और के लिए नहीं बचाते
घर में औरतें बाद में खाएं
कम पड़े तो मुस्कुरा सो जाएँ !

बेटे को मिले बढ़िया खाना
और शहर का अंग्रेजी, को-एड स्कूल
बेटी को मिले कतरन और दाना
और शायद जाए किसी सरकारी स्कूल |

बेटों को मिले हमेशा प्राथमिकता
पर ये अन्याय हमें नहीं दिखता |
हम बस मौज उड़ाते हैं
और ‘पुत्र-रत्न’ कहलाते हैं !

एक कपडा नहीं धोते,
न करते झाड़ू, या सफाई
माँ, बहन, बीबी सब करती
ऐश करते सब पापा-भाई !

बहुत हुआ ये अत्याचार,
सभ्य समाज की यही पुकार
बराबरी का हो विचार
मर्द करें घरेलू काम स्वीकार |

आर्य-पुत्र, उठो अब जाग जाओ
बनिये से राशन ले आओ |
कपडे धो के छत पे सुखाओ
सब्जी काटो और खाना पकाओ !

थोड़ा चूल्हा-चौका संभालो
बेटाजी, झाड़ू उठा लो |
पापा, आप आलू उबालिए
मसाला पके तो उसमे डालिए |

कभी आप भी चाय बनाइये
कभी माँ को खाना खिलाइए
कभी भाई लोग भी घर संभालें
औरतें भी थोड़ी फुरसत पा लें |

‘पुत्र-रत्न’ हम क्यों कहलाते
जब एक तिनका भी नहीं उठाते !?
जो असल में घर हैं चलाते
वो इसका श्रेय नहीं पाते !

जो मूंछों पे देते हो ताव,
तो जरा इक चाय बनाओ |
तनिक प्याज काटो, जीरा भूनो
कड़ाही में सरसों का छौंक लगाओ !

थोड़ा घर का काम-काज करो
जो अब न किया आज करो |
चलो, आज कपडे धो जाओ
हाथ बंटा के अब दिखाओ |

और रत्न जो किसी को कहना हो
वो माँ, बीबी या बहना हो |
समाज में जो न्याय करना हो
तो चूल्हा हर मर्द का गहना हो |

आज शाम जब घर को जाना,
तो सबके कपडे धुल के सुखाना,
पूरे परिवार के लिए खाना पकाना
बर्तन मांज के तुम सो जाना |

शेयर द लोड — हाथ बंटाओ
घर में तुम भागीदारी निभाओ |
हँसते-खेलते पोछा लगाओ
संगीनी के संग सब्जी पकाओ |

घर का काम आधे संसार का दुःख है
पर पुरुष भी करे तो अहा, क्या सुख है
इससे काम तो कम हो ही जाता है
और खुशियों में क्या इजाफा आता है !

चलो अब चूल्हा-चौका संभालो,
कभी वाशिंग मशीन चला लो |
अपने हाथों में बेलन उठा लो
गर मर्द हो तो घर संभालो !

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