किसान – Two Hindi Poems on Farmers, Agriculture, Suicides.

Find below two Hindi language poems on Farmers in India (kisan kavitayein). This Hindi poem on farmers or agriculture in India (or you may call it a poem on Indian society, nature) was written when a farmer Gajendra committed suicide at Jantar Mantar last year. The poem highlights the plight of agriculture and the deplorable conditions of farmers, peasants and farming in India. It calls in question the political class which is always there to exploit any farmer death (over a million farmers have committed suicide in the last ten years in India) but fails to take action when it is really needed.

 

The poem mentions the vagaries of monsoon, the nature of Indian politicians, the difficulties faced by the agricultural class (poor peasants) in India (bankruptcy or indebtedness is among top reasons for suicides among farmers according to the National Crime Record Bureau data). This poem will be useful for kids, policy makers, politicians, students looking for poems, slogans, rhymes, jingles, essay, song or kavita on farmers, kissan, Indian society, agriculture, Indian villages, village life in India, poem on monsoon and rains and so on. Poem is copyrighted to Dr. Vikas (this blog owner). Both the Indian society poems below in total are about 400 words.

 

1.       किसान

रोज किसान मरते हैं

पर किसी को परवाह नहीं

एक जंतर मंतर पे गुजरा

तो नेताओं को खटका कहीं !

 

मृत किसान के आगे पीछे

लगा नेताओं का तांता है

उसकी याद में घडियाली आंसू

नेता खेत में बहाता है !

 

यदि वाकई किसानों की परवाह है

तो देश उनके लिए कुछ करे

न कि बस हल्ला मचाए

जब दिल्ली में वो जा के मरे !

 

देश के कोने-कोने में

गांव, देहात, खलिहानो में

‘खेतीबाडी को सफल बनाए’

नेता डाले ये बात कानो में !

 

मंत्री जी आते जाते हैं

बस आश्वासन दे जाते हैं

सरकारें आती जाती हैं

कुछ खुल्ले दे जाती है !

 

खेतीबाड़ी बहुत कठिन है

कतना मुश्किल एक-एक दिन है

चुकाना बैंक का ऋण है

जीना बस तारे गिन गिन है !

 

रोज किसान मर रहा है

दे रहा है अपनी जान

फिर भी हिन्दुस्तानी चिल्लाते

अपना भारत देश महान !

 

आज हमारा अन्नदाता ही

नहीं ले पाता सुकूं की सांस

कर्ज, व्याज में डूबा रहता

लगाता है मॉनसून की आस !

 

किसान की कोई आवाज नहीं

ये अम्बानी, अदानीसाज नहीं

हर पेट में जाता इनका खाना

पर इनपे किसी को नाज नहीं !

 

बिन मौसम बारिश-तूफ़ान

या गिर जाए ओले

फिर भी राज्य या केंद्र में

सरकारी सिंहासन न डोले !

 

फिर कभी बारिश नहीं होती

या अनुकूल मौसम नहीं होता

फसल बर्बाद हो जाए तो

नेता घडियाली आंसूं रोता !

 

2.       भारतवर्ष का किसान

 

मैं भारतवर्ष का किसान हूँ |

मैं कागज़ पे बहुत महान हूँ |

मुझे अन्नदाता कहते हैं |

इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र या  राजनीति शास्त्र

हर किताब में मेरा जिक्र है |

हजारों योजनाएं, परियोजनाएं मेरे नाम पे चलती हैं |

देश में गरीबी हटानी है, इसलिए फोकस मुझपे होता है |

इन सब के बावजूद मैं असल में अति साधारण इंसान हूँ |

इस बात का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि

मेरे लाखों भाई बहन पिछले दशक में अपने प्राण त्याग चुके हैं |

उनकी जिंदगी इतनी भरी हो चली थी

कि मौत का रास्ता उन्हें हल्का और आसान दिखाई दिया |

हम किसान देश को खिलाते हैं

पर खुद भूखे रह जाते हैं |

अपना पेट, परिवार पाल नहीं पाते हैं |

मौसम और सरकार की मार

चुपचाप झेल जाते हैं |

कर्ज में डूबे रहते हैं हम

जीवन अपना संघर्ष और गम

आँखें चौबीस घंटे नम

दिक्कते नहीं होती कम |

में भारतवर्ष का किसान हूँ

आज तो हूँ, पर पता नहीं

कल रहूँ या न रहूँ |

1 Comment Comments For This Post I'd Love to Hear Yours!

  1. PRANJAL SINGH says:

    AMAZING WORK. EXREMELY HELPFULL. KEEP DOING IT